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94 और 98 साल की उम्र में भी नहीं रुका हौसला – मधु जी और किरण गुप्ता से सीखें सक्रिय जीवन का मंत्र

प्यारे दोस्तों,

जो लोग केवल 50 साल की उम्र में ही खुद को थका हुआ महसूस करने लगते हैं और अपनी सेहत की ओर ध्यान नहीं देते, उन्हें यह प्रेरणादायक कहानी अवश्य पढ़नी चाहिए।

जीवन का नाम चलते रहने का है। इंसान गिरता है, फिर उठता है और आगे बढ़ता है। सीखने की कोई उम्र नहीं होती। यदि हम हर दिन कुछ नया सीखते रहें और स्वयं को सक्रिय रखें, तो जीवन हमेशा उत्साह से भरा रहता है।

इसी बात का जीवंत उदाहरण हैं 94 वर्षीय किरण गुप्ता और 98 वर्षीय मधु जी। इतनी अधिक उम्र होने के बावजूद वे प्रतिदिन अखबार पढ़ती हैं, क्रिकेट मैच देखती हैं, पुराने गीत और भजन गाती हैं तथा सिलाई-बुनाई जैसे रचनात्मक कार्यों में व्यस्त रहती हैं।

कुछ समय पहले मधु जी गिर गई थीं, जिसके कारण उन्हें चलने-फिरने में कठिनाई होने लगी। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। अपनी कमजोरी को ताकत में बदलते हुए उन्होंने समाज और पर्यावरण के लिए काम करना शुरू कर दिया।

प्लास्टिक मुक्त भारत अभियान में अनोखा योगदान

पिछले पाँच वर्षों से मधु जी प्लास्टिक मुक्त भारत अभियान में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। उन्होंने बेकार कपड़ों और कपड़ों की कतरनों से 50,000 से अधिक कपड़े की थैलियाँ तैयार कीं और लोगों को बिल्कुल निःशुल्क वितरित किया।

उनका उद्देश्य केवल थैलियाँ बनाना नहीं था, बल्कि लोगों को प्लास्टिक छोड़कर पर्यावरण की रक्षा के लिए प्रेरित करना भी था।

सीखने की कोई उम्र नहीं होती

अमृतसर की रहने वाली मधु जी को कभी भी खाली बैठना पसंद नहीं था। उन्होंने सिलाई और कढ़ाई का विशेष प्रशिक्षण लिया। इतना ही नहीं, उन्होंने सिलाई मशीन की मरम्मत का छोटा-सा कोर्स भी किया ताकि मशीन खराब होने पर किसी पर निर्भर न रहना पड़े।

वे अपनी रचनात्मक सोच से नई-नई उपयोगी वस्तुएँ तैयार करती हैं और हमेशा कुछ नया सीखने का प्रयास करती रहती हैं।

एक छोटी शुरुआत बनी बड़ा अभियान

पहले वे घर के पुराने और बेकार कपड़ों से उपयोगी सामान बनाती थीं। लेकिन जब उन्होंने देखा कि लोग हर छोटी-बड़ी जरूरत के लिए प्लास्टिक की थैलियों का उपयोग कर रहे हैं, तब उन्होंने कपड़े की थैलियाँ बनाकर लोगों को मुफ्त में देना शुरू कर दिया।

धीरे-धीरे कई महिलाएँ भी इस नेक कार्य से जुड़ गईं। कोई पेंटिंग बनाने लगी, कोई आभूषण तैयार करने लगी, तो कोई सिलाई का काम करने लगी। इस प्रकार यह पहल महिलाओं के लिए प्रेरणा और आत्मनिर्भरता का माध्यम बन गई।

आत्मनिर्भरता से मिलता है सम्मान

मधु जी के एक व्यापारी मित्र उन्हें पुरानी चादरों के टुकड़े और दर्जियों की कपड़ों की कतरन उपलब्ध कराते हैं। इन्हीं से वे सुंदर और मजबूत थैलियाँ तैयार करती हैं।

साथ काम करने वाली महिलाएँ हँसी-मजाक करती हैं, बातें करती हैं और एक-दूसरे का उत्साह बढ़ाती हैं। उनके इस कार्य को देखकर लोग आश्चर्यचकित रह जाते हैं।

मधु जी का केवल एक ही संदेश है—

“मैं कभी रिटायर नहीं होऊँगी। जब तक जीवन है, तब तक सीखती और काम करती रहूँगी।”

यूरोप से भी सीखने योग्य बात

यूरोप के कई देशों में लोग पेंशन मिलने के बाद भी सक्रिय जीवन जीते हैं। वे घूमते हैं, नए लोगों से मिलते हैं, विभिन्न सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लेते हैं और अपने शौक पूरे करते हैं।

वहाँ वरिष्ठ नागरिकों के लिए छोटे-छोटे कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जहाँ अलग-अलग देशों के लोग अपने पसंदीदा भोजन, पारंपरिक पोशाक, हस्तशिल्प और आभूषणों के स्टॉल लगाते हैं। फैशन शो, संगीत, नृत्य और मनोरंजन के कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं, जिनका सभी आनंद लेते हैं।

इससे बुजुर्गों का आत्मविश्वास बढ़ता है, सामाजिक जुड़ाव मजबूत होता है और वे जीवन को खुशी के साथ जीते हैं।

हमें क्या सीख मिलती है?

  • उम्र कभी भी सफलता या सीखने में बाधा नहीं बनती।
  • हमेशा स्वयं को सक्रिय रखें।
  • खाली बैठने के बजाय अपने शौक को समय दें।
  • आत्मनिर्भर बनें और दूसरों की मदद करें।
  • पर्यावरण की रक्षा के लिए छोटे-छोटे प्रयास भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं।
  • जीवन में खुश रहने का सबसे अच्छा तरीका है—कुछ नया सीखना और समाज के लिए उपयोगी बनना।

निष्कर्ष

यदि 94 और 98 वर्ष की आयु में लोग समाज, पर्यावरण और अपने जीवन के प्रति इतने उत्साही हो सकते हैं, तो हम भी अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।

याद रखें—

“उम्र केवल एक संख्या है, असली ताकत आपके हौसले, सकारात्मक सोच और कर्म में होती है।”

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