“मालिक की दया से ही सत्य ज्ञान की प्राप्ति होती है।”
आज यह अनुभव होता है कि जीवन के कितने ही वर्ष अज्ञान में बीत गए। अब समझ में आया कि इस संसार में जो कुछ भी घटित होता है, वह परमात्मा की इच्छा के बिना संभव नहीं है। वह स्वयं अपनी योग्य और सच्ची आत्माओं को खोज लेते हैं और उन्हें अपने मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।
अच्छी सोच ही मनुष्य को उसकी मंज़िल तक पहुँचाती है। जब हमारे मन में किसी श्रेष्ठ कार्य के प्रति उत्साह और उमंग जागती है, तब कार्य करने की शक्ति स्वयं मिलने लगती है। उस समय उम्र कोई मायने नहीं रखती, केवल संकल्प और श्रद्धा ही जीवन को आगे बढ़ाते हैं।
बिन सद्गुरु सेवा जोग न होई,
बिन सद्गुरु मिले मुक्ति न होई।
संत कबीर साहिब कहते हैं कि सद्गुरु जिस पर कृपा कर दें, उसके सभी भय दूर हो जाते हैं। यमदूत भी उसके निकट आने का साहस नहीं करते। सद्गुरु अपने भक्तों को अपना स्वरूप मानकर उनके हृदय में निवास करते हैं।
भक्ति से युक्त आत्मा अनेक जन्मों के शुभ कर्मों का फल होती है। यह जीवन वास्तव में एक ऐसी यात्रा है जिसमें रास्ता भी हम हैं, राही भी हम हैं और मंज़िल भी हम स्वयं हैं। इस यात्रा का अंतिम लक्ष्य परमात्मा से मिलन है। इसलिए आठों याम उसी का चिंतन और मनन करते रहना चाहिए।
मैं स्वयं को अत्यंत भाग्यशाली मानती हूँ कि मुझे तत्वज्ञान प्राप्त हुआ। यह किसी मनुष्य की बुद्धि का परिणाम नहीं, बल्कि सद्गुरु की असीम कृपा है। मेरी दो कौड़ी की जिह्वा पर भी मालिक की कृपा हुई, इसके लिए मैं जीवनभर उनकी ऋणी रहूँगी।
ऐसा निर्मल और दिव्य ज्ञान न कभी पहले सुना और न कभी पढ़ा।
कबीर, गुरुजी तुम ना बिसरो, लाख लोग मिलि जाहि।
हम से तुमको बहुत हैं, तुमसे हमको नाहीं॥
कबीर, तुम्हें बिसारे क्या बने, मैं किसकी शरण जाऊँ।
मैं स्वीकार करती हूँ कि मुझसे जीवन में अनेक भूलें हुई हैं, अनेक अवगुण रहे हैं। फिर भी मुझे अपने सद्गुरु और मालिक की दया पर पूर्ण विश्वास है।
कबीर, औगुण किया तो बहुत किया, करत न मानी हार।
भावे बन्दा बख्शते, भावे गर्दन तार॥
जो मैं पुत्र कपूत हूँ, बहुर पिता को लाज।
बख्शो हे गरीब निवाज़॥
कबीर, मैं अपराधी जन्म का, नख-शिख भरे विकार।
तुम दाता दुख भंजना, मेरी करो संभाल॥
सद्गुरु की शरण में पहुँचकर जीवन के सभी दुख धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं। उनके चरणों में सिर झुकाकर मन को ऐसी शांति मिलती है, जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।
अंत में संत कबीर साहिब के श्रीचरणों में कोटि-कोटि प्रणाम।
हे अंतर्यामी प्रभु! यदि आपका हाथ मेरे सिर से उठ जाए तो मुझे संसार-सागर से पार कौन लगाएगा? आपकी कृपा ही मेरा एकमात्र सहारा है।
सच ही कहा गया है—
“जो आपके दर तक पहुँच जाता है, उससे बड़ा भाग्यशाली इस संसार में कोई नहीं होता।”
शेष अगले भाग में…
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