एक समय की बात है. एक राबिया नाम की लड़की को कबीर परमात्मा एक जिंन्दा बाबा के रूप में आकर मिलते है . और अपना सत ज्ञान सुनाते है और राबिया को शास्त्र अनुकूल सतभक्ति देते है। लेकिन राबिया ने 4 साल तक तो बड़ी कसक के साथ भक्ति करती है,लेकिन फिर एक मुसलमान पीर की बातो में आकर कबीर परमात्मा द्वारा दी गई भक्ति छोड़ कर मुस्लिम पीर के अनुसार भक्ति करना शुरू कर देती है।
दिन अपने पति से कहती है कि पैदल जाकर में मक्के के दर्शन करना चाहती हुं उसकापति उसका भक्ति भाव देख कर उसे मक्के के दर्शन करने जाने की आज्ञा दे देता है, जब राबिया मक्के के दर्शन करने जा रही थी तो रास्ते मे रेगिस्तान में उसे एक कुतिया अपने कुछ छोटे- छोटे पिल्लों के साथ एक कुए के पास दिखाई देती है कुतीया एक बार तो राबिया के पैरचाटती है और फिर कुएं की तरफ भागती है उसकी बार- बार इस क्रिया को देख कर राबिया समझ जाती है कि कुतिया और उसके पिल्ले बहुत प्यासे है अगर जल्द ही इनको पानी नही मिला तो इनके प्राण भी जा सकते है।
अब राबिया देखती है कि कुएं पर न रस्सी है और न ही बाल्टी है अब राबिया कुछ देर विचार करके धीरे-धीरे अपने सिर के सारे बाल उखाड़ती है, ऐसा करने से राबिया लहू लुहान हो जाती है।अब राबिया अपने सिर से उखाड़े बालो से एक रस्सी बनाती है और अपने सभी कपड़े उतार कर रस्सी के अगले हिस्से पर बांधकर उसे कुएं में डालती है और उन हुए कपड़ो को कुतिया ओर उसके पिल्लों के मुह में निचोड़ कर उनकी प्यास बुझाती है उसका भक्ति भाव देख कर मक्का अपनी जगह से चलकर राबिया के सामने आकर रूक जाता है, लेकिन राबिया फिर भी जन्म-मरण से मुक्त नही होती है।
अगले जन्म में राबिया एक बांसुरी नाम की वेश्या बनती है, लेकिन पार नही होती और राबियाके जन्म में 4 साल पूर्ण ब्रह्म कबीर परमात्मा की सत भक्ति के कारण ही राबिया तीसरा जन्म शेखत की के घर उसकी बेटी के रूप में लेती है उसका ये भी मनुष्य जीवन जब समाप्त हो चुका होता है। तब पूर्ण ब्रह्म कबीर परमात्मा शेखत की की लड़की के मृत शरीर को कब्र से निकाल कर जिंन्दा करते है और उसका नाम कमाली रखते है और उनको सतभक्ति देकर जीवन मरण से छुटकारा देकर
सतलोक लेकर जाते है।
राबिया रंगी हरि रंग मे, कैसे जीव दया दर्शायी,
राबिया रंगी हरि रंग मे, कैसे जीव दया दर्शायी,
केश उखाड़े वस्त्र उतारे, एक कुतिया की प्यास बुझाई ।
सतगुरु मेरे आजा ,दासी पई पुकार दी तेरे
मंजिल तीन मक्का ले आई, वो थी प्यासी दिदार की। सतगुरु मेरे आजा ,दासी पई पुकार दी ।
तेरे हाथ में चाँबी सतगुरु, सतलोक द्वार की ।
राबिया से बही बन्सुरी, फिर गणिका ख्याल बणाया।
राबिया से बही बन्सुरी, फिर गणिका ख्याल बणाया।
गणिका से फिर बही कमाली, तेरा ही शरणा पाया ।
शरण आप की आन्नद पाया, थी प्यासी दीदार की तेरे हाथ मे चाँबी सतगुरु, सतलोक द्वार की ।
साहेब कबीर तु आजा, आत्मा तोहे पुकारती ।
तेरे हाथ मे चाबी सतगुरु सतलोक द्वार की ।
शास्त्रानुकूल साधना से ही मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है। आज सम्पूर्ण विश्व में शास्त्रानुकुल भक्ति-साधना केवल बन्दी छोड़ महाराज ही बताते है । कई जन्मों के बाद ऐसा शुभ समय मिला इसे व्यर्थ ना गँवायें ।तत्व ज्ञान सुन कर मन अति प्रसन्न हो जाता हैं ,जब अपने मुखारबिंद से सुनाते हैं ।मन को बहुत शांति मिलती हैं ,हम बहुत भाग्य शाली हैं बह हमारे साथ हैं ।
साहेब कबीर तु आजा, आत्मा तोहे पुकारती ।
तेरे हाथ मे चाबी सतगुरु सतलोक द्वार की ।
शास्त्रानुकूल साधना से ही मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है। आज सम्पूर्ण विश्व में शास्त्रानुकुल भक्ति-साधना केवल बन्दी छोड़ महाराज ही बताते है । कई जन्मों के बाद ऐसा शुभ समय मिला इसे व्यर्थ ना गँवायें ।तत्व ज्ञान सुन कर मन अति प्रसन्न हो जाता हैं ,जब अपने मुखारबिंद से सुनाते हैं ।मन को बहुत शांति मिलती हैं ,हम बहुत भाग्य शाली हैं बह हमारे साथ हैं ।
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